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धोखा देने वालों को क्यों बोलते हैं 420? जानें इसके पीछे की रोचक वजह

a month ago
धोखा देने वालों को क्यों बोलते हैं 420  जानें इसके पीछे की रोचक वजह
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जब कभी कोई धोखा देता है तो हम आम बोलचाल में उसको 420 बोलते हैं। कभी दोस्तों के बीच भी हंसी मजाक में इस संख्या का प्रयोग करते हैं। आपने भी अपने किसी दोस्त को 420 जरूर बोला होगा जो थोड़ा तेज होता है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि हम इस संख्या को ही क्यों बोला करते हैं।किसी और संख्या जैसे 421 या 320 को क्यों नहीं बोलते हैं जब भी हमको धोखे से जुड़ी कोई बात बोलनी हो। आखिर 420 संख्या में ऐसा क्या है कि हमेशा इसी संख्या का इस्तेमाल किया जाता है। क्या आपको इसका कारण पता है। अगर आपका जवाब नहीं है तो चलिए हम आपको आप इस बारे में जानकारी देते हैं।

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भारतीय दंड संहिता में छिपी है वजह

धोखाधड़ी करने वालों को 420 बोलने की वजह भारतीय दंड संहिता में छिपी हुई है। दरअसल आईपीसी में अलग-अलग धाराएं हैं जो अलग-अलग अपराध करने वालों के खिलाफ लगाई जाती हैं। जैसे हत्या की धारा 302 है, या हत्या के प्रयास की धारा 307 है। इसी तरह जो लोग भारत में धोखाधड़ी करते हैं, उनके लिए भी खास धारा बनाई गई है। भारतीय दंड संहिता में ठगी, धोखाधड़ी या बेईमानी करने वालों के लिए जो धारा बनी है वो 420 है। जी हां धोखेबाजों के ऊपर जब भी थाने में केस दर्ज होता है तो पुलिस की ओर से 420 धारा लगाई जाती है। इसी के तहत उसके खिलाफ केस चलता है और कानूनी कार्रवाई की जाती है।

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जानें क्या है धारा 420

आईपीसी के तहत अगर भारत में रहने वाला कोई नागरिक किसी दूसरे नागरिक को धोखा देता है। उसके साथ बेईमानी या छलकपट करता है, तो उस व्यक्ति के खिलाफ धारा 420 लाई जाती है। किसी की संपत्ति के साथ हेरफेर करना या उसे खत्म करना भी इसी धारा के तहत आता है। इतना ही नहीं अगर वो इस काम में किसी की मदद भी करता है, तो वह अपराधी माना जाता है

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इतना ही नहीं अगर कोई नागरिक अपने स्वार्थ के लिए किसी अन्य नागरिक संग जालसाजी करता पाया जाता है, उसके फेक हस्ताक्षर कर, आर्थिक और मानसिक दबाव बनाते हुए उसकी संपत्ति को अपना बना लेता है तो उसके खिलाफ भी धारा 420 लगाई जा सकती है। इस धारा को काफी गंभीर धारा माना जाता है। ये अपराध गैर जमानती होता है यानि थाने से इस अपराध के आरोपी को जमानत नहीं मिल सकती है। इसके लिए प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई की जाती है। जज ही फैसला करते हैं कि जमानत दी जाए या नहीं। वहीं इन मामलों में 7 साल की सजा होती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

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Patrika News Desk

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